Sunday, November 6, 2016

बैंकर्स की कहानी

सभी बैंक और उसमें भी विशेषकर सरकारी बैंक अपने मूल बिज़नेस को छोड़ करके हर किसी को सरकारी योजना के पैसे बाँटने वाली संस्था बन गई हैं। पुरे देश की corrupt व्यस्था में सुधार लाने के लिए 100, 200 रूपया तक भी बैंको के द्वारा ही बंटवाया जा रहा हैं। बैंक अपने अनियमित ऋण खातों और NPA का क्या खाक ख्याल रखेंगे । उन्हें तो 100, 200 का हिसाब समझाने से ही फुर्सत नहीं मिल रहा हैं।
बैंक सुबह से शाम तक गैस सब्सिड़ी, छात्रवृति, वृद्धा पेंसन, बाढ़ राहत पैसा, सुखाड़ राहत पैसा, दुर्घटना राहत पैसा, 12 रुपया सुरक्षा बीमा, 330 रुपया का जीवन ज्योति बीमा, अटल पेंशन / पेंशन योजना, फसल

बीमा, गोल्ड योजना, बेरोजगारी भत्ता .....etc न जाने और कितनी योजनाओं से सम्बंधित पूछताछ, शिकायतों को समझने समझाने में ही व्यस्त हैं। हर किसी को सरकार से किसी न किसी तरह योजना से लाभ लेना हैं और उन योजनाओ को समझाने का ठीका बैंको को ही दे दिया गया हैं। सरकार किस योजना में कितना पैसा बांटेगी इसकी पूरी जानकारी भी बैंकर्स को ही रखनी हैं।
मेरा पैसा कितना आया, कब आया, क्यों नहीँ आया कब तक आएगा इत्यादि को समझाना ही बैंक का मुख्य कार्य बन गया हैं।
नहीं बताते तो उच्चस्थ कार्यालयों में शिकायत दर्ज उसका जवाब दें।
आरटीआई में शिकायत दर्ज उसका जवाब दें।
बैंकिंग लोकपाल में शिकायत दर्ज उसका जवाब दें।
लोक शिकायत में परिवाद दर्ज उसमें मुकदमा लड़ो।
अधिकांशत: शाखाओं में 2 कर्मी पदस्थापित हैं, कहीं कहीं तो सिर्फ 1 कर्मी पदस्थापित है। कुछ शाखाओं में ही 3 कर्मी और 1 से 2 प्रतिशत शाखाओं में 3 से अधिक कर्मी पदस्थापित हैं
अब उनके पास जमा राशि बढ़ाने, गुणवत्तापूर्ण ऋण प्रस्ताव ढूंढने का समय कितना बचा। शेष संपुष्टि कब लें। स्कैनिंग कब करें। केवाईसी कब करें।
लिंक नहीं या है भी तो धीरे चल रहा हैकाम में विलंब हुआ तो ग्राहक मारपिट पर उतारू और उधर बैंक प्रबंधन कारणपृक्षा देने को तत्पर। आरोप पत्र बनाने के लिए तत्पर।
बैंकर क्या करे- ग्राहकों से मारपिट करे और मुकदमा झेलने के लिए तैयार रहे, उच्चाधिकारियों की हुक्म अदुलि करे और आरोप पत्र के लिए तैयार रहे या घर न जाकर 24 घंटे बैंक का काम करता रहे या आत्म हत्या करे। आत्म हत्या तो कायर करते हैं इसलिए यह समझदारी नहीं होगी। पर यह अवश्य है कि बैंकर का सुनने वाला कोई नहीं । सिर्फ और सिर्फ उसे जवाब ही देना है।
ऐसा लगता हैं की सरकार 125+ करोड़ की आबादी के समस्याओं का हल बैंको द्वारा किसी न किसी तरीके से करवाने की चाहत रखती हैं।
यह कहानी नहीं सच्चाई है।

2 comments:

  1. Very true fact...thanks for raising the issue...

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  2. well..all these are paid services .Bankers are not free working

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